उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उपनल कर्मियों के नियमितीकरण मामले पर सख्ती दिखाई है. अदालत ने स्पष्ट किया कि साल 2018 में दिए गए आदेशों का पालन अब तक नहीं किया गया है. ऐसे में यह आदेशों की अवमानना के समान है. अदालत ने यह भी पूछा कि आखिर क्यों न इसे जानबूझकर आदेश न मानने के रूप में देखा जाए और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए.
दरअसल, प्रदेश में उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों के नियमितीकरण का मामला कई सालों से लटका हुआ है. इस प्रकरण में साल 2018 में नैनीताल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को चरणबद्ध तरीके से उपनल कर्मियों का नियमितीकरण करने के आदेश दिए थे. लेकिन सरकार ने इन आदेशों को लागू करने के बजाय सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. इसके बाद से मामला लगातार खिंचता चला आ रहा है और हजारों उपनल कर्मी अस्थायी व्यवस्था में ही काम कर रहे हैं.
राज्य सरकार ने कुछ समय पहले इस मामले पर एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित की थी, जिसे नियमितीकरण पर ठोस नीति बनाने का जिम्मा सौंपा गया था. लेकिन सात महीने बीत जाने के बाद भी नीति को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है. उपनल कर्मियों का कहना है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने तीन साल के कार्यकाल पूरा होने पर घोषणा की थी कि उपनल कर्मियों को जल्द नियमित किया जाएगा, लेकिन अब तक वादे धरातल पर नहीं उतर सके हैं. इस बीच उपनल कर्मचारी महासंघ ने सरकार के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है.
अब हाईकोर्ट की सख्ती और कर्मचारियों की चेतावनी के बीच राज्य सरकार पर दबाव और बढ़ गया है कि वह जल्द कोई निर्णायक कदम उठाए. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट सरकार की एसएलपी को खारिज कर चुका है. जिसके बाद हाई कोर्ट के 2018 के आदेश का पालन करने पर फिलहाल सरकार को निर्णय लेना है.
उपनल कर्मियों के नियमितीकरण के लिए नीति बनाने के लिए प्रमुख सचिव आर के सुधांशु की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गई है. हालांकि उपनल कर्मचारियों के सब्र का बांध टूट गया है और उन्होंने इस मामले में आंदोलन की चेतावनी दे दी है.
